Motivational

जीवन की सच्चाई।Truth of life

“सुविधा की दुविधा”
“Facility Dilemma”

सुविधा की दुविधा (Facility dilemma)

नमस्कार साथियों ,

सुविधा शब्द से आप भलीभाँति वाकिफ़ है। जैसा कि नाम से पता चल रहा है- ” आराम / चैन

आज विज्ञान तरक्की की राह पर है | मनुष्य इस धरती पर विलासिता से परिपूर्ण जीवन जी रहा है |

विज्ञान के इस देन को हम सुविधा कहते हैं।

सुविधा से अमरत्व ?

एक बात मेरे मन में प्रश्न चिन्ह लगा रही है वो यह है कि –

“क्या इस प्रकार की प्राप्त सुविधा से मनुष्य अमरत्व प्राप्ति की ओर अग्रसर तो नही हो रहा ? “

मैंने इस बारे में बहुत चिंतन मनन किया | परन्तु बात वहीं तक अटक गई कि

मनुष्य इन मशीनों के सहारे अमरत्व कैसे प्राप्त कर सकता है ? वो तो सिर्फ सहारा या सहयोग बस ले सकता है।

सुविधा व विकार

जिस प्रकार इस प्रकृति या ब्रम्हांड में दो पहलू क्रियाशील है – रात- दिन, जन्म-मृत्यु, सुख-दुख, लाभ-हानि, अच्छी-बुराई इत्यादि

तो इस सुविधा की भी दो पहलू होना चाहिए-

1.सुविधा से आराम

2. सुविधा से हराम

हमारे जीवन मे ये दोनों पहलू विद्यमान है। हमें जितनी भी सुविधा मिल जाये उसका विकार भी हमें साथ- साथ मिलता है।

तो क्या मनुष्य इस विकार से संलिप्त सुविधा के सहारे अमरत्व प्राप्त कर सकता है?

मुझे मेरे प्रश्नो का उत्तर कुछ कुछ समझने आने लगा । अमरत्व का अर्थ होता है – विकार से रहित ।

मोको कहाँ ढूंढे बन्दें ,मैं तो तेरे पास –

मेरे मन मष्तिष्क में कुछ दिनों से यह सुविधा शब्द गूंज रही थी और मैं सुविधा की दुविधा ( Facility Dilemma ) में था तो मुझे कबीरदास जी की एक भजन ने मेरा मार्ग प्रशस्त किया –

खोजि होय तो तुरंत मिलिहौं ,पल भर की तलाश में /

कहैं कबीर सुनो भाई साधो ,मैं तो हूं विश्वास में //

मोको कहाँ ढूँढ़े बन्दे ,मैं तो तेरे पास में //

-कबीर

परिणाम :-

सुविधा शब्द के प्रासंगिक अर्थ के लिए मैंने कहाँ कहाँ नहीं खोजा |

यदि मैं शब्द पर ही ध्यान दिया होता तो मुझे कब का मिल गया होता |

क्योंकि इस शब्द में ही अर्थ छुपा हुआ है —-

सुविधा को हम ऐसे लिखें- सु + वि + धा

इसमें यदि सु और धा को एक साथ लिखे तो सुधा होता है जिसका अर्थ है –अमृत

परन्तु इसमें दोनों अक्षर के बीच में वि अक्षर आ जाने से सुधा शब्द का निर्माण नहीं हो रहा है।

यदि वि = विकार मानें तो

यही वह शब्द है जो सुधा के अर्थ निर्माण में बाधा उत्पन्न कर रहा है

जैसा की मैंने पहले ही कहा है की प्रकृति के दो रूप है तथा सुविधा अपने में विकार को संलिप्त की हुई है|

अर्थात सुविधा हमें जितनी भी मिल जाये उसके साथ -साथ विकार को भी ग्रहण करना होगा |

उदाहरणार्थ -मोबाइल के आ जाने से मनुष्य को तमाम तरह की सुविधा प्राप्त है परन्तु इसके दुष्प्रभाव से भी हर कोई भलीभांति परिचित है |

निष्कर्ष :-

किसी भी वस्तु के गुण या अर्थ उस पर ही विद्यमान रहतें है। हम व्यर्थ ही बाहरी चक्कर काटते रहतें है |

सुविधा से मनुष्य अमरत्व की प्राप्ति की दिशा में जरूर है परन्तु उसे स्वयं को पहचान कर इस अमरत्व प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए | इस सन्दर्भ में मुझे स्वामी विवेकानद जी की बात याद आती है उन्होंने कहा था –

तुम्हें ईश्वर को ढूंढने कहाँ जाना हैं ? क्या -गरीब ,अनाथ ,दरिद्र ईश्वर नहीं हैं ? पहले इन्हीं की पूजा क्यों नहीं करते ?

गंगा के किनारे बैठ कर कुआँ क्यों खोदते हो ?

-स्वामी विवेकानंद

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– Dev

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